Hakeemi Na Musalmani Khudi Ki (Rubai) | हकीमी, न मुसलमानी ख़ुदी की (रुबाई)
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Bal-e-Jibreel
कलीमी, रम्ज़-ए-पिन्हानी ख़ुदी की
तुझे गुर फ़क़्र-ओ-शाही का बता दूँ
ग़रीबी में निगेहबानी ख़ुदी की।
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इस रुबाई में अल्लामा इक़बाल ने फ़क़्र (FAQR/ فقر ) अर्थात दरिद्रता की महत्ता को दर्शाया है। इस रुबाई का प्रसंग और सन्देश कोई नया नहीं है। इस्लामिक आध्यात्म अर्थात सूफ़ीवाद के अर्जन और उसकी प्राप्ति के सूत्र को नए शब्दों में पिरोया गया है।
अल्लामा इक़बाल कहते हैं कि दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) और तर्कशास्त्र (LOGIC) का अध्ययन करके उनमे महारत हासिल करने से इन्सान की ख़ुदी के अन्दर इस्लाम का रंग पैदा नहीं हो सकता बल्कि होता यह है कि कभी-कभी अपनी तर्कशक्ति और ज्ञान के चलते अल्लाह और बन्दे के दरमियान एक पर्दा बन जाता है जो जीवात्मा को परमात्मा से मिलने नहीं देता। बुज़ुर्गों ने ठीक ही कहा है- "अल-इल्मो हिजाबुल अकबर" अर्थात इल्म सबसे बड़ा पर्दा है।
रम्ज़-ए-पिन्हानी का मतलब वो वास्तविकताएं जो आँखों से छिपी रहती हैं और मनुष्य का मस्तिष्क उनको समझ नहीं सकता। इक़बाल ने इस अप्रत्यक्षता को शब्द "सिर्र-ए-निहानी" में भी प्रयुक्त किया है। एक जगह लिखते हैं :
इसी शब्द "रम्ज़" को इक़बाल ने हक़ीक़त अथवा जौहर (Essence, सार) के रूप में भी इस्तेमाल किया है। फ़ारसी पुस्तक रमूज़-ए-बेख़ुदी में लिखते हैं:
शेर की प्रथम दो पंक्तियों का निचोड़ यह है कि ख़ुदी अथवा आत्मज्ञान का मक़सद और हासिल यह है कि इंसान अल्लाह से संवाद स्थापित करे, अल्लाह के समीप हो जाए और यह तब ही मुमकिन है जब वह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की सुन्नत पर अमल करके अपने अंदर फ़क़्र पैदा करे और दरिद्र जीवन व्यतीत करे। तर्क, वाद-विवाद अथवा दर्शन से ख़ुदी का पोषण नहीं हो सकता।
इन पंक्तियों में "हकीमी" और "कलीमी" की तुलना की गयी है। इस तुलना को इक़बाल ने एक जगह बहुत स्पष्ट कर दिया है:
अगली दो पंक्तियों में "गुर" शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका मतलब है "किसी चीज़ को हासिल करने का आसान तरीका"। और "फ़क़्र-ओ-शाही" में शाही का मतलब बादशाहत है। "फ़क़्र-ओ-शाही" इन्सान की ख़ुदी के दो पहलू हैं। पहले जब दरिद्रता से ख़ुदी की दौलत मिल जाती है तो इंसान शाही मर्तबे वाला बन जाता है। "फ़क़्र-ओ-शाही" को ख़ुदी के दो पहलू बताते हुए अल्लामा ने इसका उदाहरण स्वयं हज़रत मुहम्मद (सल.) के व्यक्तित्व से दिया:
इक़बाल कहते हैं कि "फ़क़्र-ओ-शाही" की प्राप्ति का तरीका यह है कि मोमिन चाहे कितना भी ग़रीब और मुफ़लिस क्यों न हो, वह कभी अल्लाह के सिवा किसी दूसरे के आगे सवाल न करे (हाथ न फैलाये) क्यूंकि ऐसा करने से ख़ुदी मुर्दा हो जाती है और मुर्दा किसी प्रकार की तरक़्क़ी नहीं कर सकता। और रही बात ईश्वर से संवाद की, तो बिना आत्मिक तरक़्क़ी के यह संभव नहीं ! इसलिए ग़रीबी में अपनी ख़ुदी की निगेहबानी करना परमावश्यक है। अपने बेटे जावेद इक़बाल को एक वसीयत में लिखते हैं:
अल्लामा इक़बाल कहते हैं कि दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) और तर्कशास्त्र (LOGIC) का अध्ययन करके उनमे महारत हासिल करने से इन्सान की ख़ुदी के अन्दर इस्लाम का रंग पैदा नहीं हो सकता बल्कि होता यह है कि कभी-कभी अपनी तर्कशक्ति और ज्ञान के चलते अल्लाह और बन्दे के दरमियान एक पर्दा बन जाता है जो जीवात्मा को परमात्मा से मिलने नहीं देता। बुज़ुर्गों ने ठीक ही कहा है- "अल-इल्मो हिजाबुल अकबर" अर्थात इल्म सबसे बड़ा पर्दा है।
रम्ज़-ए-पिन्हानी का मतलब वो वास्तविकताएं जो आँखों से छिपी रहती हैं और मनुष्य का मस्तिष्क उनको समझ नहीं सकता। इक़बाल ने इस अप्रत्यक्षता को शब्द "सिर्र-ए-निहानी" में भी प्रयुक्त किया है। एक जगह लिखते हैं :
ख़ुदी का सिर्र-ए-निहाँ ला-इलाहा-इल्लल्लाह
इसी शब्द "रम्ज़" को इक़बाल ने हक़ीक़त अथवा जौहर (Essence, सार) के रूप में भी इस्तेमाल किया है। फ़ारसी पुस्तक रमूज़-ए-बेख़ुदी में लिखते हैं:
रम्ज़-ए-क़ुरआँ अज़ हुसैन आमोख्तीमअर्थात हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) के किरदार और शख़्सियत से मुझे क़ुरआन की तालीम से परिचय हुआ और उसकी हक़ीक़त सामने आई।
शेर की प्रथम दो पंक्तियों का निचोड़ यह है कि ख़ुदी अथवा आत्मज्ञान का मक़सद और हासिल यह है कि इंसान अल्लाह से संवाद स्थापित करे, अल्लाह के समीप हो जाए और यह तब ही मुमकिन है जब वह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की सुन्नत पर अमल करके अपने अंदर फ़क़्र पैदा करे और दरिद्र जीवन व्यतीत करे। तर्क, वाद-विवाद अथवा दर्शन से ख़ुदी का पोषण नहीं हो सकता।
इन पंक्तियों में "हकीमी" और "कलीमी" की तुलना की गयी है। इस तुलना को इक़बाल ने एक जगह बहुत स्पष्ट कर दिया है:
सोहबत-ए-पीर-ए-रूमी से मुझ पे हुआ यह राज़ फ़ाश
लाख हकीम सर-बजीब, एक कलीम सर-बकफ़।
अगली दो पंक्तियों में "गुर" शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका मतलब है "किसी चीज़ को हासिल करने का आसान तरीका"। और "फ़क़्र-ओ-शाही" में शाही का मतलब बादशाहत है। "फ़क़्र-ओ-शाही" इन्सान की ख़ुदी के दो पहलू हैं। पहले जब दरिद्रता से ख़ुदी की दौलत मिल जाती है तो इंसान शाही मर्तबे वाला बन जाता है। "फ़क़्र-ओ-शाही" को ख़ुदी के दो पहलू बताते हुए अल्लामा ने इसका उदाहरण स्वयं हज़रत मुहम्मद (सल.) के व्यक्तित्व से दिया:
फ़क़्र-ओ-शाही वारदात-ए-मुस्तुफ़ा अस्त
ईं तजल्ली हाय ज़ात-ए-मुस्तुफ़ा अस्त !
इक़बाल कहते हैं कि "फ़क़्र-ओ-शाही" की प्राप्ति का तरीका यह है कि मोमिन चाहे कितना भी ग़रीब और मुफ़लिस क्यों न हो, वह कभी अल्लाह के सिवा किसी दूसरे के आगे सवाल न करे (हाथ न फैलाये) क्यूंकि ऐसा करने से ख़ुदी मुर्दा हो जाती है और मुर्दा किसी प्रकार की तरक़्क़ी नहीं कर सकता। और रही बात ईश्वर से संवाद की, तो बिना आत्मिक तरक़्क़ी के यह संभव नहीं ! इसलिए ग़रीबी में अपनी ख़ुदी की निगेहबानी करना परमावश्यक है। अपने बेटे जावेद इक़बाल को एक वसीयत में लिखते हैं:
ख़ुदी न बेच ग़रीबी में नाम पैदा कर !__________
हकीमी: विद्व्ता, तर्कशक्ति, ज्ञान इत्यादि, कलीमी: हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की सुन्नत, रम्ज़-ए-पिन्हानी ख़ुदी की: आत्मज्ञान के अप्रत्यक्ष तत्व जिन्हें बुद्धिमत्ता अथवा तर्क के सहारे सामान्य तौर पर देखा नहीं जा सकता ; गुर: आसान तरीक़ा; फ़क़्र: दरिद्रता, ग़रीबी; शाही: बादशाही।

