Khirad-Mandon Se Kya Poochhun | ख़िरदमन्दों से क्या पूछूँ
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Bal-e-Jibreel
क: मैं इस फ़िक्र में रहता हूँ मेरी इन्तेहा क्या है। ।1।
ख़ुदी को कर बुलन्द इतना क: हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। ।2।
मक़ाम-ए-गुफ़्तगू क्या है अगर मैं कीमिया-गर हूँ
यही सोज़-इ-नफ़स है और मेरी कीमिया क्या है। ।3।
नज़र आयें मुझे तक़दीर की गहराईयाँ उस में
न पूछ ऐ हमनशीं मुझ से वो चश्मे सुरमा सा क्या है। ।4।
अगर होता वो मजज़ूब-ए-फ़िरंगी इस ज़माने में
तो इक़बाल उस को समझाता मक़ाम-ए-किबरिया क्या है। ।5।
नवाए सुबह-गाही ने जिगर खूँ कर दिया मेरा
ख़ुदाया जिस ख़ता की यह सज़ा है, वो ख़ता क्या है। ।6।
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व्याख्या:
यह ग़ज़ल अल्लामा इक़बाल के उर्दू संग्रह "बाल-ए-जिबरील" से ली गयी है। इस ग़ज़ल में इक़बाल का केन्द्रबिंदु यही है कि मनुष्य ख़ुद को पहचाने और स्वयं को अपने मालिक और पूज्य अर्थात अल्लाह से जोड़ ले। ग़ज़ल में उन तथ्यों का भी ज़िक्र है जिनका सम्बन्ध माद्दापरस्ती, भौतिकवाद इत्यादि से है। यही वजह है कि अल्लामा ने इस ग़ज़ल की शुरुआत में मानव की उत्पत्ति अथवा उदगम की बात कही। इस ग़ज़ल में केवल 6 शेर हैं जिनकी व्याख्या इस प्रकार है:
ख़िरदमन्दों से क्या पूछूँ क: मेरी इब्तिदा क्या है
क: मैं इस फ़िक्र में रहता हूँ मेरी इन्तेहा क्या है। ।1।
"इब्तिदा और इन्तेहा" अर्थात "आदि और अन्त" इस शेर की सकल पूँजी हैं। जब से मानव इस क़ाबिल हुआ है कि वह विवेक और बुद्धि का प्रयोग कर सके तब से उसने ख़ुद को अनेक प्रश्नों के मध्य घिरा हुआ पाया है जिनमे सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उसके अपने अस्तित्व या वजूद का है। प्रश्न यह कि उसकी उत्पत्ति क्यों, कब, कहाँ और कैसे हुई। दुनिया में हज़ारों दार्शनिकों, विद्वानों, पंथों और विचारधाराओं के इस सवाल पर अपने अपने मत हैं जो आज तक मानव को संतुष्ट नहीं कर पाये हैं। बहुत बड़े-बड़े ज्ञानी और विज्ञानी आये और चले गए लेकिन यह सवाल ज्यों का त्यों बना रहा। इसलिए इक़बाल कहते हैं कि इन विद्वानों और ज्ञानियों से अपनी इब्तिदा अर्थात अपने प्रस्थान बिन्दु के बारे में पूछना व्यर्थ और वक़्त की बर्बादी है क्यूँकि महत्वपूर्ण यह नहीं कि इन्सान अपने वजूद की गुत्थियों में उलझा रहे बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि वह अपनी मंज़िल और गंतव्य को पहचाने। पहचाने कि वह एक अभीष्ट पूज्य अर्थात "अल्लाह" का उपासक है। सबका मालिक वही है। और उस एक ख़ुदा को राज़ी करना ही मनुष्य का मक़सद और गन्तव्य होना चाहिए। वो समाज में भले काम करे, उसकी सृष्टि की सेवा करे और उसके आदेशों का पालन करे और उसके लगाये प्रतिबन्धों को न लाँघे-- यही मनुष्य की इन्तेहा है। मनुष्य को नहीं भूलना चाहिए कि क़ुरआन के मुताबिक़ अल्लाह के नेक बन्दे पृथ्वी में उसके ख़लीफ़ा अथवा उत्तराधिकारी हैं। अत: इंसान को चाहिए कि ईश्वर की निकटता हासिल करे। ईश्वर की निकटता हासिल करना ही उसकी इन्तेहा है। और इक़बाल हर वक़्त इसी चिन्तन में रहता है।
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ख़िरदमन्दों से: अक़्लमन्दों से, विद्वानों से, इब्तिदा: शुरुआत, प्रस्थान बिन्दु फ़िक्र: चिन्ता इन्तेहा: अंत बिन्दु, आख़िर
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ख़ुदी को कर बुलन्द इतना क: हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। ।2।
ख़ुदी की "बुलन्दी" से इक़बाल का तात्पर्य वो अवस्था है जहाँ मनुष्य अपने आप को पूर्ण रूप से अल्लाह की मर्ज़ी में ख़त्म कर दे। तसव्वुफ़ अर्थात इस्लामी आध्यात्म में इसे "रज़ा-बिल-क़ज़ा" अर्थात ख़ुदा की मर्ज़ी पर राज़ी होना कहते हैं। इक़बाल चाहते हैं कि इन्सान अपने आप को "इच्छा-शून्य" बना दे, उसकी अपनी कोई इच्छा न हो। वो ईश्वर की मर्ज़ी और विधि के विधान से पूरी तरह राज़ी हो जाये। उसके हर फ़ैसले पर पूरी तरह राज़ी हो जाये। उसके हर आदेश का पालन करे और प्रतिबन्धों को न तोड़े। इस तरह जब वह अल्लाह को राज़ी करता है तो अल्लाह भी उससे राज़ी हो जाता है। और हज़रत मुहम्मद सल. की हदीस के मुताबिक़:
अपने आप को इच्छा शून्य बनाने की बात अल्लामा ने अपने कलाम में अनेक जगह कही है। बांग-ए-दरा में लिखते हैं:
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ख़ुदी की "बुलन्दी" से इक़बाल का तात्पर्य वो अवस्था है जहाँ मनुष्य अपने आप को पूर्ण रूप से अल्लाह की मर्ज़ी में ख़त्म कर दे। तसव्वुफ़ अर्थात इस्लामी आध्यात्म में इसे "रज़ा-बिल-क़ज़ा" अर्थात ख़ुदा की मर्ज़ी पर राज़ी होना कहते हैं। इक़बाल चाहते हैं कि इन्सान अपने आप को "इच्छा-शून्य" बना दे, उसकी अपनी कोई इच्छा न हो। वो ईश्वर की मर्ज़ी और विधि के विधान से पूरी तरह राज़ी हो जाये। उसके हर फ़ैसले पर पूरी तरह राज़ी हो जाये। उसके हर आदेश का पालन करे और प्रतिबन्धों को न तोड़े। इस तरह जब वह अल्लाह को राज़ी करता है तो अल्लाह भी उससे राज़ी हो जाता है। और हज़रत मुहम्मद सल. की हदीस के मुताबिक़:
'अल्लाह इरशाद फ़रमाता है कि जब मेरा बन्दा मेरे इतने क़रीब हो जाता है कि मैं उससे मुहब्बत करने लगता हूँ तो मैं उसका कान बन जाता हूँ जिससे वह सुनता है, उसकी आँख बन जाता हूँ जिससे वह देखता है, और उसकी ज़ुबान बन जाता हूँ जिससे वह बोलता है, उसका हाथ बन जाता हूँ जिससे वह चीज़ों को पकड़ता है और वो पाँव बन जाता हूँ जिससे वह चलता है। 'इस तरह जब बन्दे को अल्लाह की इतनी निकटता हासिल हो जाये कि बन्दे को अल्लाह के सिवा कुछ भाये ही नहीं और अल्लाह को अपने बन्दे से ख़ुशी हो तो वो मक़ाम बन्दे के लिए "मर्द-ए-कामिल" (The Ultimate Man) का मक़ाम होता है जिसकी सबसे उत्तम मिसाल हज़रत मुहम्मद सल. हैं कि उनके बिना कहे ही अल्लाह ने मुसलमानों का क़िबला "बैतूल मुक़द्दस" से बदलकर "काबा" की ओर कर दिया था। ये घटना क़ुरआन में स्पष्ट शब्दों में अंकित है। जब इन्सान इस बुलन्दी पर पहुँच जाता है, ख़ुद को अल्लाह के रंग में रंग लेता है तो फिर वो "रब का वली" होता है। उसका रब अपनी क़ुदरत से वही कर देता है जो वो बन्दा चाहे।
अपने आप को इच्छा शून्य बनाने की बात अल्लामा ने अपने कलाम में अनेक जगह कही है। बांग-ए-दरा में लिखते हैं:
तू बचा-बचा के न रख इसे, तेरा आईना है वो आईनाअर्थात जितना तू ख़ुद को रब की मर्ज़ी पर पस्त रखेगा, उतना ही तू रब का प्रिय बनेगा।
क: शिकस्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाह-ए-आईनासाज़ में
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ख़ुदी: मनुष्य की आत्मा का वह वास्तविक बल जो उसको आत्मज्ञान कराता है, बुलन्द: ऊँचा, विशाल तक़दीर: भाग्य, किस्मत ख़ुदा: अल्लाह (पूज्य) बन्दे से: मनुष्य (उपासक, पूजक) रज़ा: मर्ज़ी, इच्छा
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मक़ाम-ए-गुफ़्तगू क्या है अगर मैं कीमिया-गर हूँ
यही सोज़-ए-नफ़स है और मेरी कीमिया क्या है। ।3।
यहाँ इक़बाल स्वयं को कीमियागर (अलकेमिस्ट) की उपमा दे रहे हैं जो बेकार धातुओं को भी बहुमूल्य धातु में बदल देता है। कहना का तात्पर्य यह है कि इश्क़ की रोशनी ने इक़बाल के कलाम में वो ताक़त और क़ुदरत पैदा कर दी है कि यदि कोई व्यक्ति जिसके पास थोड़ा सा भी फ़हम (समझ) है, कलाम-ए-इक़बाल को पढ़ता है, फिर अपने ज़हन और दिल को रोशन पाता है तो यह इक़बाल के भीतर जल रही इश्क़ की ज्वाला का असर है। यही इश्क़ की भट्टी इक़बाल के कलाम को रूहानियत देती है। इक़बाल के पास तो सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल (सल.) का इश्क़ है, इसके अलावा तो कोई रसायन या धातु विद्या इक़बाल को नहीं आती।
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यहाँ इक़बाल स्वयं को कीमियागर (अलकेमिस्ट) की उपमा दे रहे हैं जो बेकार धातुओं को भी बहुमूल्य धातु में बदल देता है। कहना का तात्पर्य यह है कि इश्क़ की रोशनी ने इक़बाल के कलाम में वो ताक़त और क़ुदरत पैदा कर दी है कि यदि कोई व्यक्ति जिसके पास थोड़ा सा भी फ़हम (समझ) है, कलाम-ए-इक़बाल को पढ़ता है, फिर अपने ज़हन और दिल को रोशन पाता है तो यह इक़बाल के भीतर जल रही इश्क़ की ज्वाला का असर है। यही इश्क़ की भट्टी इक़बाल के कलाम को रूहानियत देती है। इक़बाल के पास तो सिर्फ़ अल्लाह और उसके रसूल (सल.) का इश्क़ है, इसके अलावा तो कोई रसायन या धातु विद्या इक़बाल को नहीं आती।
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मक़ाम-ए-गुफ़्तगू: वार्तालाप का स्तर कीमिया-गर: सस्ती धातुओं को मूल्यवान धातू जैसे सोने में बदलने वाला रसायनविद, अलकेमिस्ट सोज़-ए-नफ़स: इश्क़ की ज्वाला कीमिया: अल्केमी
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नज़र आयें मुझे तक़दीर की गहराईयाँ उस में
न पूछ ऐ हमनशीं मुझ से वो चश्मे सुरमा सा क्या है। ।4।
यह शेर 'उर्दू ग़ज़ल' का बेहतरीन नमूना कहा जा सकता है। बुलन्दी और रब की निकटता के बाद इक़बाल अब इस तरफ़ ध्यान दिला रहे हैं कि इस बुलन्दी को किस तरह हासिल किया जाए ? कहते हैं कि इस बुलन्दी पर तू तब ही पहुँच सकता है कि जब मुर्शिद-ए-कामिल (सिद्ध आध्यात्मिक गुरु) की संगत में रहे जिसकी आँखों में अल्लाह के तालिब को अपनी तक़दीर की गहराइयाँ नज़र आती हैं। यदि पीर-ओ-मुर्शिद की उस पाक निगाह की दया एक बार किसी मुरीद पर हो जाये तो मुरीद को वो सब मिल जाता है जिसको शब्दों में लिखा नहीं जा सकता और इक़बाल कहते हैं -"न पूछ ऐ हमनशीं..."
इक़बाल के पीर-ओ-मुर्शिद हज़रत मौलाना जलालुद्दीन रूमी हैं जिनकी मसनवी ने इक़बाल को इस मक़ाम पर पहुँचाया। इनके अलावा हज़रत मुजद्दिद अल्फिसानी का अल्लामा पर गहरा प्रभाव रहा। इक़बाल के कलाम में ऐसे तमाम वलियों का वर्णन है जैसे हज़रत मौलाना रूम, हज़रत शम्स तबरेज़ी (मौलाना रूम के पीर-ओ-मुर्शिद), हज़रत बा-यज़ीद बुस्तामी, हज़रत जुनैद बग़दादी इत्यादि।
यह शेर 'उर्दू ग़ज़ल' का बेहतरीन नमूना कहा जा सकता है। बुलन्दी और रब की निकटता के बाद इक़बाल अब इस तरफ़ ध्यान दिला रहे हैं कि इस बुलन्दी को किस तरह हासिल किया जाए ? कहते हैं कि इस बुलन्दी पर तू तब ही पहुँच सकता है कि जब मुर्शिद-ए-कामिल (सिद्ध आध्यात्मिक गुरु) की संगत में रहे जिसकी आँखों में अल्लाह के तालिब को अपनी तक़दीर की गहराइयाँ नज़र आती हैं। यदि पीर-ओ-मुर्शिद की उस पाक निगाह की दया एक बार किसी मुरीद पर हो जाये तो मुरीद को वो सब मिल जाता है जिसको शब्दों में लिखा नहीं जा सकता और इक़बाल कहते हैं -"न पूछ ऐ हमनशीं..."
इक़बाल के पीर-ओ-मुर्शिद हज़रत मौलाना जलालुद्दीन रूमी हैं जिनकी मसनवी ने इक़बाल को इस मक़ाम पर पहुँचाया। इनके अलावा हज़रत मुजद्दिद अल्फिसानी का अल्लामा पर गहरा प्रभाव रहा। इक़बाल के कलाम में ऐसे तमाम वलियों का वर्णन है जैसे हज़रत मौलाना रूम, हज़रत शम्स तबरेज़ी (मौलाना रूम के पीर-ओ-मुर्शिद), हज़रत बा-यज़ीद बुस्तामी, हज़रत जुनैद बग़दादी इत्यादि।
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हमनशीं: साथी, प्रिय चश्मे सुरमा सा: वो आँख जिसमे सुरमा लगा हो
हमनशीं: साथी, प्रिय चश्मे सुरमा सा: वो आँख जिसमे सुरमा लगा हो
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अगर होता वो मजज़ूब-ए-फ़िरंगी इस ज़माने में
तो इक़बाल उस को समझाता मक़ाम-ए-किबरिया क्या है। ।5।
पिछले शेर में जो बात अल्लामा ने कही, उसके सम्बन्ध में इस शेर में कहते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के दौरान एक मार्गदर्शक का होना बहुत ज़रूरी है जिसे तसव्वुफ़ में पीर-ओ-मुर्शिद कहा जाता है। इक़बाल नीत्शे की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि नीत्शे अत्यन्त ज्ञानी था और मजज़ूबी (Mysticism) की हालत में नीत्शे को मार्गदर्शक नहीं मिल पाया और वह रास्ते से भटक गया। उसकी अक़्ल ने उसको संतुष्ट नहीं किया, और वह ईश्वर को नकार बैठा। यदि आज नीत्शे मेरे ज़माने में होता तो मैं उसको ईश्वर का मक़ाम और रुतबा बताता, वो बताता जो मैंने पीर-ए-रूमी और मुजद्दिद अल्फिसानी से सीखा।
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मजज़ूब-ए-फ़िरंगी: यूरोप का दीवाना (जर्मन दार्शनिक नीत्शे की तरफ़ इशारा) मक़ाम: स्तर किबरिया: अल्लाह
पिछले शेर में जो बात अल्लामा ने कही, उसके सम्बन्ध में इस शेर में कहते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के दौरान एक मार्गदर्शक का होना बहुत ज़रूरी है जिसे तसव्वुफ़ में पीर-ओ-मुर्शिद कहा जाता है। इक़बाल नीत्शे की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि नीत्शे अत्यन्त ज्ञानी था और मजज़ूबी (Mysticism) की हालत में नीत्शे को मार्गदर्शक नहीं मिल पाया और वह रास्ते से भटक गया। उसकी अक़्ल ने उसको संतुष्ट नहीं किया, और वह ईश्वर को नकार बैठा। यदि आज नीत्शे मेरे ज़माने में होता तो मैं उसको ईश्वर का मक़ाम और रुतबा बताता, वो बताता जो मैंने पीर-ए-रूमी और मुजद्दिद अल्फिसानी से सीखा।
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मजज़ूब-ए-फ़िरंगी: यूरोप का दीवाना (जर्मन दार्शनिक नीत्शे की तरफ़ इशारा) मक़ाम: स्तर किबरिया: अल्लाह
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नवाए सुबह-गाही ने जिगर खूँ कर दिया मेरा
ख़ुदाया जिस ख़ता की यह सज़ा है, वो ख़ता क्या है। ।6।
ग़ज़ल का यह अन्तिम शेर अल्लामा इक़बाल की इस पूरी ग़ज़ल का निचोड़ है और इसका आधार भी है। सृष्टि के निर्माण से पहले जब अल्लाह ने आलम-ए-अरवाह (रूहों की दुनिया) में बन्दों की रूहों से पूछा कि "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" तो सब ने जवाब दिया था कि बेशक तू हमारा रब है (क़ुरआन देखें, 07:172)। इक़बाल कहते हैं कि हमने अल्लाह को ही अपने जीवन का केन्द्र बनाया था, उसको रब कहा था और उससे मुहब्बत का वादा किया था लेकिन हम मे से अधिकतर वादे को भूल गए। इन्सान को उसी हस्ती से मुहब्बत करनी चाहिए जिसने उसे पैदा किया, ऐ रब ! मैं तेरे लिए सुबह के वक़्त तेरी हम्द में रोता हूँ, मेरा जिगर ख़ून के आँसू रोता है क्योंकि मुझे वादा पूरा करना है जो तुझ से किया है। बस यही मेरी खता है (यदि इसे खता समझा जाए) जो परेशान रखती है कि वादा कैसे पूरा किया जाये।
ग़ज़ल का यह अन्तिम शेर अल्लामा इक़बाल की इस पूरी ग़ज़ल का निचोड़ है और इसका आधार भी है। सृष्टि के निर्माण से पहले जब अल्लाह ने आलम-ए-अरवाह (रूहों की दुनिया) में बन्दों की रूहों से पूछा कि "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ?" तो सब ने जवाब दिया था कि बेशक तू हमारा रब है (क़ुरआन देखें, 07:172)। इक़बाल कहते हैं कि हमने अल्लाह को ही अपने जीवन का केन्द्र बनाया था, उसको रब कहा था और उससे मुहब्बत का वादा किया था लेकिन हम मे से अधिकतर वादे को भूल गए। इन्सान को उसी हस्ती से मुहब्बत करनी चाहिए जिसने उसे पैदा किया, ऐ रब ! मैं तेरे लिए सुबह के वक़्त तेरी हम्द में रोता हूँ, मेरा जिगर ख़ून के आँसू रोता है क्योंकि मुझे वादा पूरा करना है जो तुझ से किया है। बस यही मेरी खता है (यदि इसे खता समझा जाए) जो परेशान रखती है कि वादा कैसे पूरा किया जाये।
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नवा: आवाज़ अथवा संगीत सुबह-गाही: रात के अंतिम हिस्से से भोर से पहले तक की जाने वाली इबादत खूँ: खून ख़ता: ग़लती
नवा: आवाज़ अथवा संगीत सुबह-गाही: रात के अंतिम हिस्से से भोर से पहले तक की जाने वाली इबादत खूँ: खून ख़ता: ग़लती
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