Wahi Meri Kam Naseebi | वही मेरी कमनसीबी
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Bal-e-Jibreel
वही मेरी कमनसीबी, वही तेरी बेनियाज़ी
मेरे काम कुछ न आया यह कमाले ने-नवाज़ी।
मैं कहाँ हूँ तू कहाँ हैं, यह मकाँ है क: ला-मकाँ है?
यह जहाँ मेरा जहाँ है क: तेरी करिश्मासाज़ी।
इसी कश्मकश में गुज़रीं मेरी ज़िन्दगी की रातें
कभी सोज़-ओ-साज़-ए-रूमी, कभी पेच-ओ-तब-ए-राज़ी।
वो फ़रेब ख़ुर्दा शाहीं क: पला हो कर्गसों में
उसे क्या ख़बर क: क्या है रह-ओ-रस्मे शाहबाज़ी।
न ज़ुबाँ कोई ग़ज़ल की, न ज़ुबाँ से बा-ख़बर मैं
कोई दिलकुशा सदा हो, अजमी हो या क: ताज़ी।
नहीं फ़क़्र-ओ-सल्तनत में कोई इम्तियाज़ ऐसा
यह सिपाह की तेग़बाज़ी, वो निगाह की तेग़बाज़ी।
कोई कारवाँ से टूटा, कोई बदगुमाँ हरम से
क: अमीर-ए-कारवाँ में नहीं ख़ूए दिल नवाज़ी।
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