Tariq Ki Dua | तारिक़ की दुआ
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Bal-e-Jibreel
Tariq Ki Dua (Andalus Ke Maidan-e-Jang Me) | तारिक़ की दुआ (अन्दलुस के मैदान-ए-जंग में)
ये ग़ाज़ी, ये तेरे पुर-असरार बन्दे
जिन्हें तूने बख़शा है ज़ौक़-ए-ख़ुदाई
दो नीम इनकी ठोकर से सहरा-ओ-दरिया
सिमट कर पहाड़ इनकी हैबत से राई
दो आलम से करते हैं बेगाना दिल को
अजब चीज़ है लज़्ज़त-ए-आशनाई.
शहादत है मतलूब-ओ-मक़सूद-ए-मोमिन
न माल-ए-ग़नीमत न किश्वर कुशाई.
ख़याबाँ में हैं मुन्तज़िर लाला कब से
क़बा चाहिए इस को खून-ए-अरब से.
किया तूने सहरा-नशीनों को यकता
ख़बर में, नज़र में, अज़ान-ए-सहर में.
तलब जिस की सदियों से थी ज़िन्दगी को
वो सोज़ इसने पाया इन्हीं के जिगर में.
कुशाद-ए-दर-ए-दिल समझते हैं इसको
हलाकत नहीं मौत इनकी नज़र में
दिल-ए-मर्द-ए-मोमिन में फिर जिंदा कर दे
वो बिजली क: थी नारा-ए-"ला-तज़र" में.
अज़ाइम को सीनों में बेदार कर दे
निगाह-ए-मुसलमाँ को तलवार कर दे.
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