Kabhi Ae Haqiqat-e-Muntazar | कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़र
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कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़र ! नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
क: हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में
तरब आशना-ए-ख़रोश हो, तू नवा है महरम-ए-गोश हो
वो सुरूद क्या क: छुपा हुआ हो सकूत-ए-परदा-ए-साज़ में
तू बचा-बचा के न रख इसे, तेरा आईना है वो आईना
क: शिकस्ता हो तो अज़ीज़तर है निगाह-ए-आईनासाज़ में
दम-ए-तोफ़ करमक-ए-शमआ ने यह कहा क: वो असर-ए-कोहन
न तेरी हिकायत-ए-सोज़ में, न मेरी हदीस-ए-गुदाज़ में
न कहीं जहाँ में अमाँ मिली, जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली
मेरे जुर्म-ए-ख़ाना ख़राब को तेरे उफ़्वे बंदा नवाज़ में
न वो इश्क़ में रहीं गर्मियां, न वो हुस्न में रहीं शोखियाँ
न वो ग़ज़नवी में तड़प रही, न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में
जो मैं सर बसज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो सनम-आशना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
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