Digargun Hai Jahan | दिगरगूं है जहाँ
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Bal-e-Jibreel
दिगरगूं है जहाँ तारों की गर्दिश तेज़ है साक़ी
दिल हर ज़र्रा में ग़ोग़ा-ए-रस्ता ख़ैज़ है साक़ी.
मताअ-ए-दीन-ओ-दानिश लुट गयी अल्लाह वालों की
यह किस काफ़िर अदा का ग़मज़ा-ए-खूँरेज़ है साक़ी.
वही दैरीना बीमारी, वही ना-महकमी दिल की
इलाज इसका वही आब-ए-निशात अंगेज़ है साक़ी.
हरम के दिल मैं सोज़-ए-आरज़ू पैदा नहीं होता
क: पैदाई तेरी अब तक हिजाब आमेज़ है साक़ी.
न उटठा फिर कोई रूमी अजम के लालाज़ारों से
वही आब-ओ-गिल-ए-ईराँ, वही तबरेज़ है साक़ी.
नहीं है ना-उम्मीद इक़बाल अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी.
फ़क़ीर-ए-राह को बख्शे गये असरार-ए-सुल्तानी
बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साक़ी.
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दिल हर ज़र्रा में ग़ोग़ा-ए-रस्ता ख़ैज़ है साक़ी.
मताअ-ए-दीन-ओ-दानिश लुट गयी अल्लाह वालों की
यह किस काफ़िर अदा का ग़मज़ा-ए-खूँरेज़ है साक़ी.
वही दैरीना बीमारी, वही ना-महकमी दिल की
इलाज इसका वही आब-ए-निशात अंगेज़ है साक़ी.
हरम के दिल मैं सोज़-ए-आरज़ू पैदा नहीं होता
क: पैदाई तेरी अब तक हिजाब आमेज़ है साक़ी.
न उटठा फिर कोई रूमी अजम के लालाज़ारों से
वही आब-ओ-गिल-ए-ईराँ, वही तबरेज़ है साक़ी.
नहीं है ना-उम्मीद इक़बाल अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो तो यह मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी.
फ़क़ीर-ए-राह को बख्शे गये असरार-ए-सुल्तानी
बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साक़ी.
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